Friday, September 14, 2012

भिखारन माँ


निगाहे दौड़ती रहती है
आसरा ढ़ूढती रहती है
कभी इधर कभी उधर
एक छोटी सी ज़मी का टुकड़ा
जहा बैठ सकू खुद को समेटकर

क्या मैंने पहना है
क्या मेरे पास है
एक गन्दी थैली प्लास्टिक की
वही खजाने खास है

ना देखती मैं कपड़ो को
ना देखती मोटर कार को
लालच की क्या परिभाषा दू
जब जीभ तरस गयी आचार को

शहनाई सुनु  सड़को पर जब मैं
तो छलक आये संसार है
और कैसे करे याद वो औरत
जो विधवा और लाचार  है

पेट का खेल तो सब जाने है
फिर भी सबने माऱा  है
इक चमचमाती पाकिट नमकीन की
पेट बांध , घंटो निहारा है

जिन हाथो से दान दिए थे
उनको आज कैसे फैलाऊ
जो छुए तेरे फ़िल्मी दिल को
ऐसे बोल कहा से लाऊ

मिट्टी  में सनी हूँ
मिट्टी का इंतज़ार है
बस य़ू  ही न फेक देना
मैं हिन्दू हूँ
जलना मेरा  भी अधिकार है 

हमने भी लाये थे इलाईची दाने
अपने पल्लू में बांधकर
इन बूढी आँखों को देखो गौर से
नज़र आयेगी एक माँ तुम्हे
अपना सब कुछ हारकर
अपना सब कुछ हारकर 

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