Wednesday, March 17, 2010

Arziya

इस जमी पे जिन्दा हर जमीर हिलती है
तख्त पे लटकी वो तस्वीर हिलती है
हाथो में मचल रही इन रेखाओ का क्या ?
जब खुदा की लिक्खी तक़दीर हिलती है।

बुझा न सके वो चिंगारिया
शमशान में जलती आग को
दिखा न सके वो चिंगारिया
मेरे बुझते चिराग को
हमें तो पहले ही दफना दिया था
गैरो की मिटटी में
फिर भी उन अंतिम उखरती सासों में
हम ढूंढते रहे आपको,बस आपको


दीया तो दिया था उसने
उस रात भी
पिया था पिया के लिए हमने
उस रात भी
चुप तो हमभी नहीं बैठ सकते
तुम्हे गैरो के साथ देखकर
वो तो तुमने ही बिठा दिया था हमें
उस रात भी

©Aditya Kumar

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