Wednesday, January 16, 2019

एक जगह तो ऐसी हो

समुन्दर की कोख में,
रात का इक कोना है
जिसे सूरज ढलते
अभी पूरी दुनिया में होना है

वो दुनिया,
जो मेरी शंका के शून्य से
तुम्हारे विश्वास के अनंत तक खींची हुई है

और खींची हुई है लकीरे
हमारी कोशिश
और कोशिश के जवाबो के बीचो बिच
जिन्हे हम अकसर पार करके
मिला लेते है
हाथ..गला...और होठ

और जहां
मिला नहीं पाते है लोग
मुठ्ठी भर भी उजाला समुन्दर में
और घुल जाते है रात की अँधेरी चाश्नी में
जैसे घुलते है बादल बरस कर हवाओं में
और ओढ़ लेती है धरती
हरा लहू तृप्ति का
अच्छा सुनो..
मैंने सींच दिया है अपने बीच की धरती को
तुम भी ओढ़ लेना कोई हरा रंग

कुछ लोग बदनसीब लाचार
जिसे ओढ़ते है , उसे बिछा भी लेते है
मौसम के बदलते तेवर में भी
अपना काम चला ही लेते है
चलो...
चलो पैदा करे हम इक लाचारी अपने बीच
मैं तुम्हे ओढ़ लूँ किसी धूप में
तुम मुझे बिछा लो किसी ठंड में

आओ,
आओ पिघलाए ठंडी जमीं नसों को
जिनमे कूट-कूट कर भरा गया था प्यार
आओ जलाये दिया समुद्र की तलहटी में
कि कभी न होने पाए रात
आओ कर दे सुराख़ अपनी छाती में
कि मिले गले तो मिल जाए रक्त भी
आओ बनाये इक वृक्ष,
विशाल और छायादार
जिसमे पल उठे ,भरा पूरा इक नया संसार
ताकि एक जगह तो ऐसी हो
जहाँ अपनी उंगलिया फंसा कर
इक दूसरे से
दम तोड़ दे हम हँसते-हँसते

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