ऐसा लगता है जिंदगी
एक घने गलियों वाला शहर है
और हम भटकते रहते है
सही ठिकानो के लिए
कुछ ठिकाने हमने
बचपन में खोज लिए थे
जिनके रस्ते अब तक कंठस्त है
पर जब भी हमें कोई मुहाना
ठिकाना होने जैसा लगता है
हम अपना एक टुकड़ा
खुद से अलग करके
छोड़ देते है कोतवाली के लिए
वक़्त गुजरता जाता है
और कोतवाल बढ़ते जाते है
और घटता जाता है
हम में से हमारापन
कभी भूले, या अक्सर
जब हमे ऐसे मुहाने
दुबारा मिलते है
हम देखते है कोतवाल
अब कोतवाल नहीं
बस एक सवाल है
जो बस एक-तक
हमारी आँखों में झांकता है
धीरे धीरे, हर मुहाना
एक सवाल में बदल जाता है
और हो जाता है हमारा भटकना
मुश्किल और दूभर
फिर एक दिन, हमारे पास
हम नहीं, बस सवाल बच जाते है
तो हम बचे हम के साथ
मुहीम बनाते है
हम को पूरा करने की
सवालो से अपने टुकड़े
वापस लाने की
फिर हमें सही ठिकानो की
चिंता नहीं रहती
फिर हमें चिंता रहती है
सिर्फ और सिर्फ
हम में जी रहे हमारेपन की
कि किस तरह बचा ले जाये
हम, अपने हमारेपन को
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Wednesday, August 26, 2020
Thursday, May 28, 2020
मुसाफिर
(बहुत पहले की लिखी कविता)
सड़के है सुनसान
चला जा रहा एक इंसान
पी के कुछ जाम
अपने प्यार के नाम
दूर कुछ रौशनी सी नज़र आ रही है
जिसकी आस में चाल बढ़ती जा रही है
खुश हूँ इस घने अँधेरे में रौशनी को देखकर
पर रौशनी की दूरी भी बढ़ती जा रही है
अब तो किसी की आस ना रही
दिल में पलते यादों की एहसास ना रही
प्यास तो लगी थी बहुत पहले से
उनके प्यार की
पर उस प्यास की, अब प्यास ना रही
मुसाफिर मुझ जैसे, अब नज़र आते नहीं इस राह में
बहुत पीछे छूट गए है किसी की चाह में।
सड़के है सुनसान
चला जा रहा एक इंसान
पी के कुछ जाम
अपने प्यार के नाम
दूर कुछ रौशनी सी नज़र आ रही है
जिसकी आस में चाल बढ़ती जा रही है
खुश हूँ इस घने अँधेरे में रौशनी को देखकर
पर रौशनी की दूरी भी बढ़ती जा रही है
अब तो किसी की आस ना रही
दिल में पलते यादों की एहसास ना रही
प्यास तो लगी थी बहुत पहले से
उनके प्यार की
पर उस प्यास की, अब प्यास ना रही
मुसाफिर मुझ जैसे, अब नज़र आते नहीं इस राह में
बहुत पीछे छूट गए है किसी की चाह में।
करो बातें
मुझसे करो बातें
जो हो बारीक, महीन
तुम्हारे बालों की तरह !
बुन दो जाल
आसान सा,
और मैं
सुलझा लू सुबह होने तक
फिर सो जाऊ
तुम्हारा सवेरे वाला
चेहरा देखकर
जो हो बारीक, महीन
तुम्हारे बालों की तरह !
बुन दो जाल
आसान सा,
और मैं
सुलझा लू सुबह होने तक
फिर सो जाऊ
तुम्हारा सवेरे वाला
चेहरा देखकर
Wednesday, December 4, 2019
बड़े होकर सुधरना
रोज़ ही तो शाम होती है
रोज़ ही हम सपनो से थके लौटते है
और रोज़ ही सपनो में खो जाते है
बस इक एहसास की लत है
जिसके बिना हर रोज़ अधूरा लगता है
आदत पड़ गयी है
लत अच्छी नहीं होती
शायद वही लग गयी है मुझे
जब घूमता नहीं तो खो जाता हूँ
बहुत फिल्मी हो गया हूँ आजकल
जान जगहों पड़ अनजान चेहरों में
इक कहानी तलाशने लगता हूँ
बिलकुल सुराग वाले जासूस किरदार की तरह
चढ़ जाता हूँ खुद की निगाहो में
एकदम शराब की तरह
और तब तक उबलता रहता हूँ
रेत के टीलों पर
जब तक शब्द की हवा उड़ा नहीं देती
मैं मूर्ख या बेवक़ूफ़ नहीं, ढोंगी और डरपोक हूँ
भला खुद से भी भागने का कोई अंत होता है
बड़ा हूँ गया हूँ मैं
अब बस प्यार वाली डाँट खाता हूँ
चोट वाली डाँट से रोये एक अरसा हो गया है
काश,
काश कोई मेरी खातिर
मेरी खातिर, मेरी ही खातिर
मुझे एक जोरदार तमाचा मार दे दिल से
क्योकि ,
बचपन से आजतक बिन पिटे सुधरा नहीं हूँ
रोज़ ही हम सपनो से थके लौटते है
और रोज़ ही सपनो में खो जाते है
बस इक एहसास की लत है
जिसके बिना हर रोज़ अधूरा लगता है
आदत पड़ गयी है
लत अच्छी नहीं होती
शायद वही लग गयी है मुझे
जब घूमता नहीं तो खो जाता हूँ
बहुत फिल्मी हो गया हूँ आजकल
जान जगहों पड़ अनजान चेहरों में
इक कहानी तलाशने लगता हूँ
बिलकुल सुराग वाले जासूस किरदार की तरह
चढ़ जाता हूँ खुद की निगाहो में
एकदम शराब की तरह
और तब तक उबलता रहता हूँ
रेत के टीलों पर
जब तक शब्द की हवा उड़ा नहीं देती
मैं मूर्ख या बेवक़ूफ़ नहीं, ढोंगी और डरपोक हूँ
भला खुद से भी भागने का कोई अंत होता है
बड़ा हूँ गया हूँ मैं
अब बस प्यार वाली डाँट खाता हूँ
चोट वाली डाँट से रोये एक अरसा हो गया है
काश,
काश कोई मेरी खातिर
मेरी खातिर, मेरी ही खातिर
मुझे एक जोरदार तमाचा मार दे दिल से
क्योकि ,
बचपन से आजतक बिन पिटे सुधरा नहीं हूँ
तो गिरू क्यों ?
मैं अजीब हूँ
जो केवल वक़्त बर्बाद करना चाहता हूँ
आबाद नहीं
आबाद क्यों नहीं, ये मुद्दा है
और मुद्दो के लिए वक़्त नहीं है
जो चीज़े चले नहीं उसे खीचू क्यों
जो चल रही है उसे रोकू क्यों
मैं जो आया हूँ, तो पूरा करूँगा अपना कोष
मुझे दिखती है दीवारे
दीवारे, दशकों पुरानी दीवारे
मैं दिवार भी तो हूँ
वो दिवार भी, जो भरे बाजार में
लोगो का पेशाब सूंघती है
या वो जिसे अनजाने में लोग खुरच देते है
मैं जो दिवार हूँ
अगर ढह नहीं रही तो गिरू क्यों ?
जो केवल वक़्त बर्बाद करना चाहता हूँ
आबाद नहीं
आबाद क्यों नहीं, ये मुद्दा है
और मुद्दो के लिए वक़्त नहीं है
जो चीज़े चले नहीं उसे खीचू क्यों
जो चल रही है उसे रोकू क्यों
मैं जो आया हूँ, तो पूरा करूँगा अपना कोष
मुझे दिखती है दीवारे
दीवारे, दशकों पुरानी दीवारे
मैं दिवार भी तो हूँ
वो दिवार भी, जो भरे बाजार में
लोगो का पेशाब सूंघती है
या वो जिसे अनजाने में लोग खुरच देते है
मैं जो दिवार हूँ
अगर ढह नहीं रही तो गिरू क्यों ?
Tuesday, December 3, 2019
सुराख़
अभी कल ही तो देखा था उसे
घर के आँगन में सुराख़ भरते
वो सुराख़ जिसमे चीटियां रहती थी
वो सुराख़ जिसमे अब चीटियां नहीं रहती
वो सुराख़ जिसमे अब जीव नहीं मुर्दे रहते है
वो सुराख़ जो घर से शवघर बन गया
वो सुराख़ जहा बस अँधेरा और सन्नाटा है
वो सुराख़ जो केवल ऊपर से भरा है
वो सुराख़ जो एक खोखला अतीत मात्र है
तीव्रता कम हो गयी है
जैसे तीव्रता कम हो गयी है
प्यार करने की
उदास होने की
सबकी
अब कुछ भी मुझे भीतर तक अनुभव नहीं होता
बाकी,
मन के समुन्द्र में जो भी बचा है
उसमे,
प्यार में एक दो लहरे उठती है
और उदासी में एक दो गिरती
बाकी अनुभूतिया
बस स्थिर में ही पनपती है
और स्थिर में ही समा जाती है
Thursday, September 26, 2019
अमानवीय बीज
सूखी लम्बी फूल की कतारे
लगा दी जाती है नकली पेड़ो के बीच
और साथ ही सज जाती है
असली पेड़ो से बनी मेज़ और कुर्सियां
इन पर बैठ कर कोई
बन जाना चाहता है
प्रेमचंद अपनी किताब का
वो सुनकर लिखना जानता है
उसे सुनाई देता है पंछी
पर उन पेड़ो पर पंछी दिखते नहीं
वो कल्पना कर लेता है
उसे सुनाई देती है हवा
पर बदन में जरा भी फड़फड़ाहट नहीं होती
वो कल्पना कर लेता है
वो लिखता है अनंत कल्पनाये
वो लिखता है अनंत अनुभव
वो लिखता है अनंत पन्ने
सब मात्र सुनकर
बिना महसूस किये
बिना देखे
इक दिन,
उसे सुनाई देती है
वास्तविक क्रंदन
डकारती हुई चीख
रोते हुए सांसो का उखड़ना
और वो सुनता है इन्हे
आँखे खोलकर अपने कानो से
इक बीज कही अँकुरित हो
मुस्कान की तरह निकलता है
उसके होठो से
अब उसे कल्पना के सहारे की जरुरत नहीं।
लगा दी जाती है नकली पेड़ो के बीच
और साथ ही सज जाती है
असली पेड़ो से बनी मेज़ और कुर्सियां
इन पर बैठ कर कोई
बन जाना चाहता है
प्रेमचंद अपनी किताब का
वो सुनकर लिखना जानता है
उसे सुनाई देता है पंछी
पर उन पेड़ो पर पंछी दिखते नहीं
वो कल्पना कर लेता है
उसे सुनाई देती है हवा
पर बदन में जरा भी फड़फड़ाहट नहीं होती
वो कल्पना कर लेता है
वो लिखता है अनंत कल्पनाये
वो लिखता है अनंत अनुभव
वो लिखता है अनंत पन्ने
सब मात्र सुनकर
बिना महसूस किये
बिना देखे
इक दिन,
उसे सुनाई देती है
वास्तविक क्रंदन
डकारती हुई चीख
रोते हुए सांसो का उखड़ना
और वो सुनता है इन्हे
आँखे खोलकर अपने कानो से
इक बीज कही अँकुरित हो
मुस्कान की तरह निकलता है
उसके होठो से
अब उसे कल्पना के सहारे की जरुरत नहीं।
Wednesday, August 14, 2019
मिलता है कल आज से
तुमने जो पूरी लकीर
खींची थी मेरे बदन पर
वो अब आधी हो गयी है
और आधे पे उग आयी है खिड़की
जिससे झांकता है
कल आज होने के लिए
कल, जिसमे तुमने
नापे थे पहाड़
पार की थी नदिया
चले थे सैकड़ो मील
पर हांफ जाते थे
मेरे मकान की सीढ़िया चढ़ते हुए
शायद इसीलिए वो मकान
हमारा घर नहीं हो पाया कभी
कल,
जब सारे हिस्से तुम्हारे थे
सारे रस्ते तुम्हारे थे
दिन और रात तुम्हारा था
पर तुम व्यस्त थे
बंद करते हुए खुद को
किसी कोठरी में
कल जब किसी कल
तुम न आये थे
आने वाले कल का
इंतज़ार करता हुआ कल
आज तक नहीं सोया
और जितने आंसू आये
वो उम्र की इज़्ज़त बचाने में
कल की आँखों में पसर कर रह गए
पर सच तो ये है
कि लकीर आधी हुई ही नहीं
मैंने मान लिया
खिड़की कभी उगी ही नहीं
मैंने मान लिया
और मेरा आज
जो जी रहा आधी लकीर में
अब भी कभी झाँक के तलाश लेता है
कल से भी पुराने कल को
जिसमे तुम दौड़ रहे होते हो
मेरी ओर
और अगले ही पल
दोनों खड़े होते है
पारदर्शी शीशे के दोनों तरफ
हथेलिया मिलाते हुए
खींची थी मेरे बदन पर
वो अब आधी हो गयी है
और आधे पे उग आयी है खिड़की
जिससे झांकता है
कल आज होने के लिए
कल, जिसमे तुमने
नापे थे पहाड़
पार की थी नदिया
चले थे सैकड़ो मील
पर हांफ जाते थे
मेरे मकान की सीढ़िया चढ़ते हुए
शायद इसीलिए वो मकान
हमारा घर नहीं हो पाया कभी
कल,
जब सारे हिस्से तुम्हारे थे
सारे रस्ते तुम्हारे थे
दिन और रात तुम्हारा था
पर तुम व्यस्त थे
बंद करते हुए खुद को
किसी कोठरी में
कल जब किसी कल
तुम न आये थे
आने वाले कल का
इंतज़ार करता हुआ कल
आज तक नहीं सोया
और जितने आंसू आये
वो उम्र की इज़्ज़त बचाने में
कल की आँखों में पसर कर रह गए
पर सच तो ये है
कि लकीर आधी हुई ही नहीं
मैंने मान लिया
खिड़की कभी उगी ही नहीं
मैंने मान लिया
और मेरा आज
जो जी रहा आधी लकीर में
अब भी कभी झाँक के तलाश लेता है
कल से भी पुराने कल को
जिसमे तुम दौड़ रहे होते हो
मेरी ओर
और अगले ही पल
दोनों खड़े होते है
पारदर्शी शीशे के दोनों तरफ
हथेलिया मिलाते हुए
Wednesday, January 16, 2019
कुछ है, तो कुछ रहेगा
तमाशा है, तो तमाशा रहेगा
दुनिया में हो, तो हताशा रहेगा
कभी किसी से मांग लो जाम
जो प्यासा है, वो प्यासा रहेगा
कभी गुस्से में भी कर लो प्यार
जो पिटा है, वो खींचा सा रहेगा
तम्मना दिल की उलट कर देखो
जो नहीं देखा, वो सपना सा रहेगा
समेट लो, बना लो जहाँ मुक्कमल
जो मिला नहीं, तो निराशा रहेगा
फूट गयी ज्वालामुखी दर्द की
जो आँखें है, तो पानी सा रहेगा
पाल लो, इक जानवर ही सहीं
जब कोई नही, तो अपनासा रहेगा
बाल उसके उलझा कर सो गए
जो सुबह हुई, तो भरोसा रहेगा
लगा लो तस्वीर अपने वालिद की
जो घर हो, कोई तो बड़ा सा रहेगा
आगमन की प्रतीक्षा
मैं तुम्हे नहीं जानता
वैसे ही
जैसे भगवान को नहीं जानता
पर जानने की इच्छा रखता हूँ
मेरी इच्छा मेरी किताब की पहली भूमि है
जिसमे अपनेपन के बीज को रोपना है
और तमाम मौसमो के मुठ-भेड़ से बचाते हुए
उस हद तक पनपने देना है
जहा खड़ा रहता है वृक्ष
जहा खड़ा रहता है वृक्ष
अपने केचुओं, बेलो, चीटियों, कुकरमुत्तों सहित
वैसे ही
जैसे भगवान को नहीं जानता
पर जानने की इच्छा रखता हूँ
मेरी इच्छा मेरी किताब की पहली भूमि है
जिसमे अपनेपन के बीज को रोपना है
और तमाम मौसमो के मुठ-भेड़ से बचाते हुए
उस हद तक पनपने देना है
जहा खड़ा रहता है वृक्ष
जहा खड़ा रहता है वृक्ष
अपने केचुओं, बेलो, चीटियों, कुकरमुत्तों सहित
इतिहास का पत्थर
मैं जो हूँ
सदियों से खड़ा
अपनी मिटटी में गड़ा
धसा के पैर अपने घुटने तक
ना जाने कितने संग्राम लड़ा
अब सुनो मेरे पत्थरो की चीख
जो मांगते है भीख तुम पत्थरो से
कि हटा लो हथेलिया मेरे गर्दन से
तुम्हारा ये करुण स्पर्श, मेरे हित में नहीं
और चले जाओ मेरी खस्ता हालत से दूर
ताकि तिन-तिन कर
अपने पत्थरो को खोकर
मेरे अपने पत्थरो को
मैं मर सकूं अपनी उम्र में
तुम नहीं जानते मेरे शरीर को
तुम्हारा मुझे पवित्र करना
मुझे मार देने जैसा होगा
सदियों से खड़ा
अपनी मिटटी में गड़ा
धसा के पैर अपने घुटने तक
ना जाने कितने संग्राम लड़ा
अब सुनो मेरे पत्थरो की चीख
जो मांगते है भीख तुम पत्थरो से
कि हटा लो हथेलिया मेरे गर्दन से
तुम्हारा ये करुण स्पर्श, मेरे हित में नहीं
और चले जाओ मेरी खस्ता हालत से दूर
ताकि तिन-तिन कर
अपने पत्थरो को खोकर
मेरे अपने पत्थरो को
मैं मर सकूं अपनी उम्र में
तुम नहीं जानते मेरे शरीर को
तुम्हारा मुझे पवित्र करना
मुझे मार देने जैसा होगा
बहुत देर होने से पहले
"उसको" विपदा आयी
"उसको" कठिन परिस्थितियों ने घेरा
"उसकी" हालत ज़ख़्मी है
तुमने "उसको" जाना
क्या सही है पहचाना
क्या राह उचित होगी
चुनकर बतलाया
अंदर से कोई ज़ख़्मी सकुचाया
उदासीनता की खिड़की से झाका
एक टक आँखों में देखता रहा
पत्थरो को छाती पर फेकता रहा
बोझ का पलड़ा ठेलता रहा
और फिर तराजू टूट गया
कोई बिन कहे ही सो गया
कि
मेरी राह कब चुनोगे
जो बीमारी "उसको" थी
वो मुझे भी है , शायद
क्या उचित है मुझे बतलाओ
फैसला सुनाओ
हाथ पैर चलाओ
मुझसे मिलो
मुझे सुनो
बहुत देर होने से पहले
"उसको" कठिन परिस्थितियों ने घेरा
"उसकी" हालत ज़ख़्मी है
तुमने "उसको" जाना
क्या सही है पहचाना
क्या राह उचित होगी
चुनकर बतलाया
अंदर से कोई ज़ख़्मी सकुचाया
उदासीनता की खिड़की से झाका
एक टक आँखों में देखता रहा
पत्थरो को छाती पर फेकता रहा
बोझ का पलड़ा ठेलता रहा
और फिर तराजू टूट गया
कोई बिन कहे ही सो गया
कि
मेरी राह कब चुनोगे
जो बीमारी "उसको" थी
वो मुझे भी है , शायद
क्या उचित है मुझे बतलाओ
फैसला सुनाओ
हाथ पैर चलाओ
मुझसे मिलो
मुझे सुनो
बहुत देर होने से पहले
एक जगह तो ऐसी हो
समुन्दर की कोख में,
रात का इक कोना है
जिसे सूरज ढलते
अभी पूरी दुनिया में होना है
वो दुनिया,
जो मेरी शंका के शून्य से
तुम्हारे विश्वास के अनंत तक खींची हुई है
और खींची हुई है लकीरे
हमारी कोशिश
और कोशिश के जवाबो के बीचो बिच
जिन्हे हम अकसर पार करके
मिला लेते है
हाथ..गला...और होठ
और जहां
मिला नहीं पाते है लोग
मुठ्ठी भर भी उजाला समुन्दर में
और घुल जाते है रात की अँधेरी चाश्नी में
जैसे घुलते है बादल बरस कर हवाओं में
और ओढ़ लेती है धरती
हरा लहू तृप्ति का
अच्छा सुनो..
मैंने सींच दिया है अपने बीच की धरती को
तुम भी ओढ़ लेना कोई हरा रंग
कुछ लोग बदनसीब लाचार
जिसे ओढ़ते है , उसे बिछा भी लेते है
मौसम के बदलते तेवर में भी
अपना काम चला ही लेते है
चलो...
चलो पैदा करे हम इक लाचारी अपने बीच
मैं तुम्हे ओढ़ लूँ किसी धूप में
तुम मुझे बिछा लो किसी ठंड में
आओ,
आओ पिघलाए ठंडी जमीं नसों को
जिनमे कूट-कूट कर भरा गया था प्यार
आओ जलाये दिया समुद्र की तलहटी में
कि कभी न होने पाए रात
आओ कर दे सुराख़ अपनी छाती में
कि मिले गले तो मिल जाए रक्त भी
आओ बनाये इक वृक्ष,
विशाल और छायादार
जिसमे पल उठे ,भरा पूरा इक नया संसार
ताकि एक जगह तो ऐसी हो
जहाँ अपनी उंगलिया फंसा कर
इक दूसरे से
दम तोड़ दे हम हँसते-हँसते
रात का इक कोना है
जिसे सूरज ढलते
अभी पूरी दुनिया में होना है
वो दुनिया,
जो मेरी शंका के शून्य से
तुम्हारे विश्वास के अनंत तक खींची हुई है
और खींची हुई है लकीरे
हमारी कोशिश
और कोशिश के जवाबो के बीचो बिच
जिन्हे हम अकसर पार करके
मिला लेते है
हाथ..गला...और होठ
और जहां
मिला नहीं पाते है लोग
मुठ्ठी भर भी उजाला समुन्दर में
और घुल जाते है रात की अँधेरी चाश्नी में
जैसे घुलते है बादल बरस कर हवाओं में
और ओढ़ लेती है धरती
हरा लहू तृप्ति का
अच्छा सुनो..
मैंने सींच दिया है अपने बीच की धरती को
तुम भी ओढ़ लेना कोई हरा रंग
कुछ लोग बदनसीब लाचार
जिसे ओढ़ते है , उसे बिछा भी लेते है
मौसम के बदलते तेवर में भी
अपना काम चला ही लेते है
चलो...
चलो पैदा करे हम इक लाचारी अपने बीच
मैं तुम्हे ओढ़ लूँ किसी धूप में
तुम मुझे बिछा लो किसी ठंड में
आओ,
आओ पिघलाए ठंडी जमीं नसों को
जिनमे कूट-कूट कर भरा गया था प्यार
आओ जलाये दिया समुद्र की तलहटी में
कि कभी न होने पाए रात
आओ कर दे सुराख़ अपनी छाती में
कि मिले गले तो मिल जाए रक्त भी
आओ बनाये इक वृक्ष,
विशाल और छायादार
जिसमे पल उठे ,भरा पूरा इक नया संसार
ताकि एक जगह तो ऐसी हो
जहाँ अपनी उंगलिया फंसा कर
इक दूसरे से
दम तोड़ दे हम हँसते-हँसते
Thursday, June 7, 2018
इर्द गिर्द के लोग
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ है मोटे दिमाग से
कुछ बंद डब्बो में रहते है
कुछ की चमड़ी मखमल सी नाजुक
कुछ पानी से बहते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ की छाया संकीर्ण डंडी सी
समा ना पाए एक आदमी भी
कुछ फलो से है लदे भी
कुछ तराजू ले के चलते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ ने चबा रख्खी है नागफनी
कुछ ने उगा रख्खे है कांटें
कुछ दावा करते है गुलाब का
कुछ बिन कहे ही बोल पड़ते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ ने ढक रख्खा है खुद को
कुछ खुले आम घूमते है
कुछ लेके चलते है कम्बल
ठण्ड देख ओढ़ लेते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
हम जो है जानवर समाज के
यार की फ़िराक में घूमते ही रहते
हार कर यार की पोशाक को
समझौतो से जन्मे "कुछ" के सर
जड़ते की रहते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ है मोटे दिमाग से
कुछ बंद डब्बो में रहते है
कुछ की चमड़ी मखमल सी नाजुक
कुछ पानी से बहते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ की छाया संकीर्ण डंडी सी
समा ना पाए एक आदमी भी
कुछ फलो से है लदे भी
कुछ तराजू ले के चलते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ ने चबा रख्खी है नागफनी
कुछ ने उगा रख्खे है कांटें
कुछ दावा करते है गुलाब का
कुछ बिन कहे ही बोल पड़ते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
कुछ ने ढक रख्खा है खुद को
कुछ खुले आम घूमते है
कुछ लेके चलते है कम्बल
ठण्ड देख ओढ़ लेते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
हम जो है जानवर समाज के
यार की फ़िराक में घूमते ही रहते
हार कर यार की पोशाक को
समझौतो से जन्मे "कुछ" के सर
जड़ते की रहते है
ये लोग मेरे इर्द गिर्द रहते है
मेरे कुछ नहीं लगते है
मुबारक हो
आज जो लिखने बैठा हूँ
तो सोच रहा हूँ की
दिल उतार कर रख्खा कैसे जाता है।
"साहब, भूख लगी है , खाना दो"
क्या ये शायरी है
क्या आपको रुला सकती है
क्या इसे भारत भूषण से सम्मानित किया जा सकेगा
क्या इसे कोई पत्रिका प्रकाशित करेगी
क्या ये क्रन्तिकारी नहीं
क्या ये आप बीती नहीं
क्या ये वाक्य पूरा नहीं
क्या इसका व्याकरण ठीक नहीं
क्या आपकी आँखें डबडबा गयी
क्या दिल में कोई तीर लगा
क्या आप मोम की तरह नहीं पिघले
अगर आपके साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ
तो आपको वो फलाने की बोलें अच्छी क्यों लगी
आपने मेले से अजीम शायरों की किताबे क्यों खरीदी
आपकी आँखें वो सिनेमा देख के छलछला क्यों गयी थी
बड़ी शिद्दत से उस दिन आपने प्यार का नगमा सुना था
वाह - वाह कहते थके नहीं थे आप
और आज,
आज क्या हो गया आपको
किसी हसीन दुनिया का पिद्दा सा दर्द
जैसे दाल में नमक ज्यादा पड़ गया हो
जो चुटकी भर नमक ज्यादा लग रहा है
ठीक उतने की बड़े इलाके की शायरी सुनते है आप
मुबारक हो आपको अपना इलाका
तो सोच रहा हूँ की
दिल उतार कर रख्खा कैसे जाता है।
"साहब, भूख लगी है , खाना दो"
क्या ये शायरी है
क्या आपको रुला सकती है
क्या इसे भारत भूषण से सम्मानित किया जा सकेगा
क्या इसे कोई पत्रिका प्रकाशित करेगी
क्या ये क्रन्तिकारी नहीं
क्या ये आप बीती नहीं
क्या ये वाक्य पूरा नहीं
क्या इसका व्याकरण ठीक नहीं
क्या आपकी आँखें डबडबा गयी
क्या दिल में कोई तीर लगा
क्या आप मोम की तरह नहीं पिघले
अगर आपके साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ
तो आपको वो फलाने की बोलें अच्छी क्यों लगी
आपने मेले से अजीम शायरों की किताबे क्यों खरीदी
आपकी आँखें वो सिनेमा देख के छलछला क्यों गयी थी
बड़ी शिद्दत से उस दिन आपने प्यार का नगमा सुना था
वाह - वाह कहते थके नहीं थे आप
और आज,
आज क्या हो गया आपको
किसी हसीन दुनिया का पिद्दा सा दर्द
जैसे दाल में नमक ज्यादा पड़ गया हो
जो चुटकी भर नमक ज्यादा लग रहा है
ठीक उतने की बड़े इलाके की शायरी सुनते है आप
मुबारक हो आपको अपना इलाका
Sunday, December 10, 2017
लागत
ये धंधा मंदा है बाकियों के लिए
मेहनत लगती है सलीका सीखने के लिए
आशिक़ मिज़ाजी तो कर लेते है फुटकर में भी
जुगत लगती है नसीहत थोक में बेचने के लिए
मौजूदगी का एहसास तो सभी कराते है
एक अरसा लगता है गैरमौजूदगी पनपने के लिए
प्यार तो सिखा देते है लोग करके
अतफाल-ए-सुकूँ चाहिए मन मचलने के लिए
चीखना चिल्लाना,रोना गाना सुन लेती है भीड़ भी
एक बोझा गिरता है आदमी के हलक तक पहुँचने के लिए
जब खुद के अनासिर से आजुर्दा हो जाते है लोग
फिर मौत लगती हैं इश्क़ में जीतने के लिए
अब और लिखोगे, तो रो दोगे "तपिश"
जिगर का टुकड़ा लगता है,कागज़ पे मरने के लिए
-आदित्य
मेहनत लगती है सलीका सीखने के लिए
आशिक़ मिज़ाजी तो कर लेते है फुटकर में भी
जुगत लगती है नसीहत थोक में बेचने के लिए
मौजूदगी का एहसास तो सभी कराते है
एक अरसा लगता है गैरमौजूदगी पनपने के लिए
प्यार तो सिखा देते है लोग करके
अतफाल-ए-सुकूँ चाहिए मन मचलने के लिए
चीखना चिल्लाना,रोना गाना सुन लेती है भीड़ भी
एक बोझा गिरता है आदमी के हलक तक पहुँचने के लिए
जब खुद के अनासिर से आजुर्दा हो जाते है लोग
फिर मौत लगती हैं इश्क़ में जीतने के लिए
अब और लिखोगे, तो रो दोगे "तपिश"
जिगर का टुकड़ा लगता है,कागज़ पे मरने के लिए
-आदित्य
Thursday, September 7, 2017
जिंदगी से तगाफुल कब तक
कुछ नहीं करना, बस पड़े रहना
जिंदगी से तगाफुल कब तक
उदास हो जाना, कभी हस पड़ना
ये आर पार की झंझट कब तक
ये लोग फिर बसेरा लेकर आ गए
एक ही खेत में इतने फसल कब तक
मैं जो मारने चला था सांप को
मिलते रहे इक चेहरे में इतने शक्ल कब तक
ठंडी हवा थी,खेतो का अनंत दृश्य
गाँव से बने रहे अनजान कब तक
कल रोज़ पत्थरो सी होती थी रिश्तेदारी
अक्स और रूह जुदा रहेंगे कब तक
दो थप्पड़ मारे, चुप कराने को
पलते रहेंगे बच्चे ऐसे कब तक
आग बरसा है पिता के हाथ घर पर
झुलसती रहेगी भूख ऐसे कब तक
कोई अँधा हुआ , कोई बहरा
मामला दर्ज नहीं घर का कब तक
अब जो बैठे हो, तो सेंकोगे गुलाब
जलती रहेगी मसाल आखिर कब तक
खालीपन का बोझ है , इंसानो से नफरत
आसमान में दिखेगा आफताब कब तक
फिर मिलेंगे उनसे, कर बैठेंगे उल्फत
रौशनी बिजली से होती रहेगी कब तक
शहर गए, गाँव गए, हवा हो गए
चंद रिश्तो में जीते रहेंगे कब तक
कुछ बड़ा कर , तू गली बन जा
इमारते गवाह देंगी नहीं कब तक
चाहने वाले, मरने वाले, एक से नहीं
उलझाता रहेगा अपनों का धागा कब तक
दीवार है, नज़र है , तो दरारे है
इस कसमकस में सोयेगा नहीं कब तक
तस्वीर तस्सवुर का , तस्सवुर में तस्वीर
बड़े-छोटे की गहराई नापेगा कब तक
मैला है , धुल है, पसीना बदन में
शीशे के इस पार से देखेगा कब तक
कुछ नहीं करना, बस पड़े रहना
जिंदगी से तगाफुल कब तक
-आदित्य
Thursday, September 29, 2016
ख़ुशी के प्रतिबिंब
कि खबर कुछ यों सी है
कि हमें एहसास हुआ
हमारे होने का, खुश होने का
हमें एहसास हुआ,
की हम चल रहे है
और हमारे साथ और भी
कौन किसकी गाड़ी में किसके साथ चल रहा है
कोई नहीं जानता।
पर क्या इस सड़क पे
सिर्फ आगे देख के आनंद लिया जा सकता है
मौसम का,
ताज़ा हवाओ का
प्रकृति का या प्रवृति का ?
कि खबर कुछ यों सी है
कि पिछले ही पल कोई मर गया था
कट कर , छिन-छिन होकर बिखर गया था
लहूलुहान होकर, अनगिनत टुकड़ो में।
और हमें एहसास हुआ
मौसम कितना डरावना है
और हवा कितनी विषैल।
अभी बगल से गुज़री है कोई खुशनुमा गाड़ी
फिर से....... फिर से
डूब गया हूँ सोच में
हमारे होने का , खुश होने का
वाकई !.......
वाकई अतीत बहुत घुलनसील है
और गाड़ी में लगे आईने से
हम अतीत को झांकते है
या अतीत खुद ?
पर पिछला आईना हो तो
लोग झांक ही लेते है।
-आदित्य
कि हमें एहसास हुआ
हमारे होने का, खुश होने का
हमें एहसास हुआ,
की हम चल रहे है
और हमारे साथ और भी
कौन किसकी गाड़ी में किसके साथ चल रहा है
कोई नहीं जानता।
पर क्या इस सड़क पे
सिर्फ आगे देख के आनंद लिया जा सकता है
मौसम का,
ताज़ा हवाओ का
प्रकृति का या प्रवृति का ?
कि खबर कुछ यों सी है
कि पिछले ही पल कोई मर गया था
कट कर , छिन-छिन होकर बिखर गया था
लहूलुहान होकर, अनगिनत टुकड़ो में।
और हमें एहसास हुआ
मौसम कितना डरावना है
और हवा कितनी विषैल।
अभी बगल से गुज़री है कोई खुशनुमा गाड़ी
फिर से....... फिर से
डूब गया हूँ सोच में
हमारे होने का , खुश होने का
वाकई !.......
वाकई अतीत बहुत घुलनसील है
और गाड़ी में लगे आईने से
हम अतीत को झांकते है
या अतीत खुद ?
पर पिछला आईना हो तो
लोग झांक ही लेते है।
-आदित्य
जिंदगी आज कल
जिंदगी इन दिनों अजीब सी है
वक़्त आजकल ना मौका देता है , ना वक़्त
और देर हो जाती है
आभास के आभास होने तक।
बस कुछ शब्द उठते है
आते है , जाते है
ना कोई कम्पन होती है
ना कोई आवाज उठती है
बस धूल के कुछ कण
फिर से जम जाते है, जाने पहचाने कोनो में
और पहरा लगाने लगते है
मनचले, बदमाश तरंगे।
मानो ये हो चोर है और कोतवाल भी !!
-आदित्य
वक़्त आजकल ना मौका देता है , ना वक़्त
और देर हो जाती है
आभास के आभास होने तक।
बस कुछ शब्द उठते है
आते है , जाते है
ना कोई कम्पन होती है
ना कोई आवाज उठती है
बस धूल के कुछ कण
फिर से जम जाते है, जाने पहचाने कोनो में
और पहरा लगाने लगते है
मनचले, बदमाश तरंगे।
मानो ये हो चोर है और कोतवाल भी !!
-आदित्य
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